छोड़ो यह किस्सा, यह किस्सा तो है कुर्सी का,
मिलेगा नाम उस पर राजकरणियों का, लगा है जोड़ फेवीकोल का।
अमलदारों के पास यदि है पहुँचना, पैसे बिना वहाँ नही जाना
पैसे की लेन-देन पड़ेगी करना, लालच उसे तो ना कहना।
जग में तो आज कैसे जीना, चलन है सब जगह पैसे का
आवाज तेरी कौन सुनेगा, गूँजता है आवाज जहाँ पैसे का।
तू भी तो ना कुछ बन सकेगा, यदि सही हाथ पकड़ने वाला ना मिलेगा,
पी रही है खून तो कुर्सी सबका, यह किस्सा तो है कुर्सी का।
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)