Bhaav Samadhi Vichaar Samadhi - Kaka Bhajans
Bhaav Samadhi Vichaar Samadhi - Kaka Bhajans
Hymn No. 4066 | Date: 28-Jul-1992
कैसे कहूँ, कब कहूँ, क्यों कहूँ, क्या कहूँ, समझ में आता नही, क्या करूँ
Kaisē kahūm̐, kaba kahūm̐, kyōṁ kahūm̐, kyā kahūm̐, samajha mēṁ ātā nahī, kyā karūm̐

સ્વયં અનુભૂતિ, આત્મનિરીક્ષણ (Self Realization, Introspection)

Hymn No. 4066 | Date: 28-Jul-1992

कैसे कहूँ, कब कहूँ, क्यों कहूँ, क्या कहूँ, समझ में आता नही, क्या करूँ

  No Audio

kaisē kahūm̐, kaba kahūm̐, kyōṁ kahūm̐, kyā kahūm̐, samajha mēṁ ātā nahī, kyā karūm̐

સ્વયં અનુભૂતિ, આત્મનિરીક્ષણ (Self Realization, Introspection)

1992-07-28 1992-07-28 https://www.kakabhajans.org/bhajan/default.aspx?id=16053 कैसे कहूँ, कब कहूँ, क्यों कहूँ, क्या कहूँ, समझ में आता नही, क्या करूँ कैसे कहूँ, कब कहूँ, क्यों कहूँ, क्या कहूँ, समझ में आता नही, क्या करूँ

कहूँ तो कैसे कहूँ, कुछ समझ में नहीं आता, मैं कैसे कहूँ

करूँ तो कहाँ से शुरू करूँ, समझ में नहीं आता, कहाँ पर रूकूँ

यकीन नहीं है दिलमें, शुरू करूँ, फिर भी पूरा मैं कर सकूँ

कहना चाहता हूँ, जुबाँ पर नही आता, तब मैं क्या करूँ

रुक जाती है जुबाँ मेरी, आती नज़र में मूर्ति तेरी, तब मैं क्या करूँ

कोई अनुभव नहीं, सुनी सुनाई पर यकीन नहीं, तब मैं कैसे कहूँ

कर दिया है जब शुरू, तब कह ही दूँ, कहना है, तब पूरा कर दूँ।
View Original Increase Font Decrease Font


कैसे कहूँ, कब कहूँ, क्यों कहूँ, क्या कहूँ, समझ में आता नही, क्या करूँ

कहूँ तो कैसे कहूँ, कुछ समझ में नहीं आता, मैं कैसे कहूँ

करूँ तो कहाँ से शुरू करूँ, समझ में नहीं आता, कहाँ पर रूकूँ

यकीन नहीं है दिलमें, शुरू करूँ, फिर भी पूरा मैं कर सकूँ

कहना चाहता हूँ, जुबाँ पर नही आता, तब मैं क्या करूँ

रुक जाती है जुबाँ मेरी, आती नज़र में मूर्ति तेरी, तब मैं क्या करूँ

कोई अनुभव नहीं, सुनी सुनाई पर यकीन नहीं, तब मैं कैसे कहूँ

कर दिया है जब शुरू, तब कह ही दूँ, कहना है, तब पूरा कर दूँ।




सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)
Lyrics in English Increase Font Decrease Font

kaisē kahūm̐, kaba kahūm̐, kyōṁ kahūm̐, kyā kahūm̐, samajha mēṁ ātā nahī, kyā karūm̐

kahūm̐ tō kaisē kahūm̐, kucha samajha mēṁ nahīṁ ātā, maiṁ kaisē kahūm̐

karūm̐ tō kahām̐ sē śurū karūm̐, samajha mēṁ nahīṁ ātā, kahām̐ para rūkūm̐

yakīna nahīṁ hai dilamēṁ, śurū karūm̐, phira bhī pūrā maiṁ kara sakūm̐

kahanā cāhatā hūm̐, jubām̐ para nahī ātā, taba maiṁ kyā karūm̐

ruka jātī hai jubām̐ mērī, ātī naja़ra mēṁ mūrti tērī, taba maiṁ kyā karūm̐

kōī anubhava nahīṁ, sunī sunāī para yakīna nahīṁ, taba maiṁ kaisē kahūm̐

kara diyā hai jaba śurū, taba kaha hī dūm̐, kahanā hai, taba pūrā kara dūm̐।
English Explanation Increase Font Decrease Font


In this Bhajan Shri Devendra Ghia ji fondly remembered as Kakaji by his followers is describing hesitation of a seeker

How to say, when to say, why to say, what to say, unable to understand, what do I do.

How can I say, not able to understand, how do I say.

From where do I start, not able to understand, where do I stop.

I do not believe in my heart, if I start, would I be able to finish.

I want to say but I am unable to, what do I do.

Unable to say anything, when your form comes in my sight, what do I do then

Have no experience nor do believe in hearsay then how do I say.

When I have started then I should say what is to be said to complete
Scan Image

Hindi Bhajan no. 4066 by Satguru Devendra Ghia - Kaka
First...406340644065...Last