कर्म हमारे रहम के काबिल नही है, या खुदा,
फिर भी मैं तेरी रहमत चाहता हूँ, यकीन करना ना कुछ और चाहता हूँ।
दीवाना हूँ दीवाना हूँ, तेरी प्यार भरी नज़रों का दीवाना हूँ,
तेरे प्यार भरी नज़रों की मैं इनायत चाहता हूँ।
करूँ मैं याद तुझे, या ना करूँ, हर वक्त तू मुझे याद रखता है।
मेरा यकीन ना बदलना चाहता हूँ, तेरी प्यार भरी नज़र चाहता हूँ।
हर नशे में झूम उठता हूँ मैं, पिलाता रहे तू, तेरी प्यार भरी निगाहों से
ना कोई और चाहत है, तेरी प्यार भरी, बस निगाह चाहता हूँ
बसा के तुझे अपने दिल में, तुझ से ना दूर रहना चाहता हूँ।
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)