कहूँ तो मैं, कैसे कहूँ, प्रभु कहूँ तो मैं कैसे कहूँ?
कहना चाहता हूँ, है जो दिल में, जुबाँ पर मैं ना ला सकूँ
कहना चाहता बहुत कुछ, फिर भी कुछ मैं ना कह सकूँ
कहना है जब तुझे प्रभु, आता नही समझ में, कहाँ से शुरू करूँ?
दुःख की बात कहूँ तुझे प्रभु, या सुख की बात तो मैं करूँ
है दिल में जो, कहना चाहता हूँ, जुबाँ पर वह कैसे लाऊँ
तेरे बिना ना है कोई सुनने वाला मेरा, तुझे बात मेरी कहूँ?
आज नहीं तो कल, कहनी पड़ेगी, क्यों ना आज ही कहूँ?
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)