हर मंजिल के पीछे कोई और मंजिल तो होती है
वही और मंजिल के पीछे, इंत़जार की तीसरी मंजिल होती है
मंजिल मंजिल पर ना तू रुकना, और मंजिल पर पहुँचना है
एक मंजिल पर पहुँचे बिना, दूसरी मंजिल ढूँढ़ना ठीक नही है
हर मंजिल पर मुकाम रखना थोड़ा, अंतिम मंजिल पर पहुँचना है
मंजिल के बाद रहे ना बाकी कोई मंजिल, वही अंतिम मंजिल होती है
मंजिल पर चलते चलते थक ना जाना, अंतिम मंजिल पर पहुँचना है
हर मंजिल को अपनी मंजिल ना समझना, वह तो धोखा देती है
जब मंजिल पर पहुँचना है तुझे, तुझे ही चलना होगा, यह निश्चित है
जब मिल जाए मंजिल तुझे तेरी, जीवन में ना उसे कुछ पाना है
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)