BHAAV SAMADHI VICHAAR SAMADHI - Hindi BHAJAN

Hymn No. 7372 | Date: 18-May-1998
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थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला

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Thi Do Manzil Mere Samne, Kis Aur Mein Jao Na Pataa Muje Chala

જીવન માર્ગ, સમજ (Life Approach, Understanding)


Hindi Bhajan no. 7372 by Satguru Devendra Ghia - Kaka
थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला
चलते रहा मैं यहाँ वहाँ, फिर भी मंज़िल को मेरी, ना मैं पा सका
थी दो मंजिल मेरी आँखों के सामने, किस ओर जाऊँ, ना तय मैं कर सका
थी नज़र तो फिरती यहाँ से वहाँ, फिर भी मेरी मंज़िल का पता ना चला
कहाँ रुकना, कहाँ चलना, ना फैसला उसका जीवन में मैं कर पाया
इंत़जार में बीती रात तो कैसे, ना मुझे इसका तो पता चला
ना दो मंजिल को एक कर पाया जीवन में, उलझन में मैं उलझता रहा
समय की जंजीरों में था बँधा हुआ, मंज़िल की ओर चलना मुश्किल बना दिया
ढूँढ़ते मंज़िल मेरी, बंद कर दी आँखें मैंने मेरी, मंज़िल का पता मुझे मिला
तब दो मंज़िल बन गई एक मेरी, तब मैं रहा, दृश्य ना कोई और रहा
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)




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Publications
He has written about 10,000 hymns which cover various aspects of spirituality, such as devotion, inner knowledge, truth, meditation, right action and right living. Most of the Bhajans are in Gujarati, but there is also a treasure trove of Bhajans in English, Hindi and Marathi languages.
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