Bhaav Samadhi Vichaar Samadhi - Kaka Bhajans
Bhaav Samadhi Vichaar Samadhi - Kaka Bhajans
Hymn No. 7372 | Date: 18-May-1998
थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला
Thī dō maṁja़ila mērē sāmanē, kisa ōra maiṁ jāūm̐ nā patā mujhē calā

જીવન માર્ગ, સમજ (Life Approach, Understanding)

Hymn No. 7372 | Date: 18-May-1998

थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला

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thī dō maṁja़ila mērē sāmanē, kisa ōra maiṁ jāūm̐ nā patā mujhē calā

જીવન માર્ગ, સમજ (Life Approach, Understanding)

1998-05-18 1998-05-18 https://www.kakabhajans.org/bhajan/default.aspx?id=15361 थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला

चलते रहा मैं यहाँ वहाँ, फिर भी मंज़िल को मेरी, ना मैं पा सका

थी दो मंजिल मेरी आँखों के सामने, किस ओर जाऊँ, ना तय मैं कर सका

थी नज़र तो फिरती यहाँ से वहाँ, फिर भी मेरी मंज़िल का पता ना चला

कहाँ रुकना, कहाँ चलना, ना फैसला उसका जीवन में मैं कर पाया

इंत़जार में बीती रात तो कैसे, ना मुझे इसका तो पता चला

ना दो मंजिल को एक कर पाया जीवन में, उलझन में मैं उलझता रहा

समय की जंजीरों में था बँधा हुआ, मंज़िल की ओर चलना मुश्किल बना दिया

ढूँढ़ते मंज़िल मेरी, बंद कर दी आँखें मैंने मेरी, मंज़िल का पता मुझे मिला

तब दो मंज़िल बन गई एक मेरी, तब मैं रहा, दृश्य ना कोई और रहा
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थी दो मंज़िल मेरे सामने, किस ओर मैं जाऊँ ना पता मुझे चला

चलते रहा मैं यहाँ वहाँ, फिर भी मंज़िल को मेरी, ना मैं पा सका

थी दो मंजिल मेरी आँखों के सामने, किस ओर जाऊँ, ना तय मैं कर सका

थी नज़र तो फिरती यहाँ से वहाँ, फिर भी मेरी मंज़िल का पता ना चला

कहाँ रुकना, कहाँ चलना, ना फैसला उसका जीवन में मैं कर पाया

इंत़जार में बीती रात तो कैसे, ना मुझे इसका तो पता चला

ना दो मंजिल को एक कर पाया जीवन में, उलझन में मैं उलझता रहा

समय की जंजीरों में था बँधा हुआ, मंज़िल की ओर चलना मुश्किल बना दिया

ढूँढ़ते मंज़िल मेरी, बंद कर दी आँखें मैंने मेरी, मंज़िल का पता मुझे मिला

तब दो मंज़िल बन गई एक मेरी, तब मैं रहा, दृश्य ना कोई और रहा




सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)
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Lyrics in English
thī dō maṁja़ila mērē sāmanē, kisa ōra maiṁ jāūm̐ nā patā mujhē calā

calatē rahā maiṁ yahām̐ vahām̐, phira bhī maṁja़ila kō mērī, nā maiṁ pā sakā

thī dō maṁjila mērī ām̐khōṁ kē sāmanē, kisa ōra jāūm̐, nā taya maiṁ kara sakā

thī naja़ra tō phiratī yahām̐ sē vahām̐, phira bhī mērī maṁja़ila kā patā nā calā

kahām̐ rukanā, kahām̐ calanā, nā phaisalā usakā jīvana mēṁ maiṁ kara pāyā

iṁta़jāra mēṁ bītī rāta tō kaisē, nā mujhē isakā tō patā calā

nā dō maṁjila kō ēka kara pāyā jīvana mēṁ, ulajhana mēṁ maiṁ ulajhatā rahā

samaya kī jaṁjīrōṁ mēṁ thā bam̐dhā huā, maṁja़ila kī ōra calanā muśkila banā diyā

ḍhūm̐ḍha़tē maṁja़ila mērī, baṁda kara dī ām̐khēṁ maiṁnē mērī, maṁja़ila kā patā mujhē milā

taba dō maṁja़ila bana gaī ēka mērī, taba maiṁ rahā, dr̥śya nā kōī aura rahā
Hindi Bhajan no. 7372 by Satguru Devendra Ghia - Kaka
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