मिल रहा है नशा जो तेरी नज़रों में, वह नशा शराब में कहाँ,
मिलती है मिठास जो तेरी जुबां में, वह मिठास शक्कर में कहाँ।
मिले ना जो दर्शन तेरा ख्वाबों में, तो वह ख्वाब ख्वाब क्या,
जो विचार जीवन बदल ना सके, वह विचार तो विचार क्या।
जो अग्नि तो जला ना सके, वह अग्नि तो अग्नि क्या,
जो मुलाकात यादगार ना बन सकी, वह मुलाकात, मुलाकात क्या।
जो सफर मंजिल पर ना पहुँचाये, वह सफर तो सफर क्या,
जिस हास्य में से रुदन की रेखा फूटे, जीवन में वह हास्य तो हास्य क्या।
जो कार्य जीवन में परिणाम ना ला सके, वह कार्य तो कार्य क्या,
जिस दिन में शुभ काम किये ना हो, वह दिन तो दिन क्या।
सत्गुरु श्री देवेंद्र घिया (काका)