निगाह को आज तेरी क्या हुआ है? क्यों हुआ है क्यों बदल गई हैं?
निगाह तो आज तेरी, कुछ छुपा रही हैं, कुछ और कर रही हैं।
दे दे आज एक निगाह ऐसी, तसल्ली मिल जाय दिल को, तू मेरी है, तू मेरी है,
ओ निगाह के चाहने वाले, सुन ले बात मेरी, जो दी थी वह तो निगाह थी मेरी,
निगाह तो ऐसी एकबार तो है दी जाती, वह तो तुझे मैंने तो दे दी,
संजोग बदलते रहते हैं, निगाह बदलती है ना बदलती निगाह तो तुझे दे दी।
ना मिला संतोष, ना बदलती निगाह से तेरी माँग में कर दे तू ही बदली
चाहिए निगाह तुझे मेरी, ऐसी दे दी सब इच्छाएँ तेरी चरणो में मेरे।
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)