तनबदन के कपड़े, अनेक तूने है तो बदले,
इस बदन के कपड़ों से मोह क्यों किये जा रहा है?
यह कपड़ा जीर्ण होकर नाश उनका होनेवाला है,
ऐसे नाशवंत कपड़े से मोह क्यों किये जा रहा है?
विकारों का दाग क्यों लगा दिया है, उसमें रे भाई,
धोते धोते उन्हें नाक में दम तो आने वाला है।
विशुद्धता की परछाई में धो-धोकर सुखा दे तू उन्हें,
उज्ज्वल बना दे तू उन्हें, समा जाएगा तब तो नज़र में।
सतगुरू देवेंद्र घिया (काका)